Ram Prasad Bismil In Hindi Essay Book

पंडित रामप्रसाद ‘बिस्मिल’

Ram Prasad Bismil

महान क्रांतिकारी पंडित रामप्रसाद ‘बिस्मिल’ का जन्म शाहजहांरुर में ज्येष्ठ शुक्ल पक्ष एकादशी विक्रम संवत 1954 को हुआ था। उनकी आरंभिक शिक्षा गांव में ही एक स्कूल में हुई। बचपन में रामप्रसाद शरारती किस्म के बालक थे। स्कूल में तो रामप्रसाद ‘बिस्मिल’ पढ़ नहीं पाए, किंतु घर में स्वाध्याय में लगे रहे। घुड़सवारी, तैराकी, साइकिल चलाना, व्यायाम व योगासन में उनकी बहुत रुचि थी। आगे चलकर उन्होंने विभिन्न भाषाओं का गहरा अध्ययन किया। हिंदी, बंगला और अंग्रेजी का राम प्रसाद ‘बिस्मिल’ ने अच्छा ज्ञान प्राप्त किया। रामप्रसाद ‘बिस्मिल’ ने ‘अमेरिका को स्वतंत्रता कैसे मिली’, ‘स्वदेश रंग’ आदि पुस्तकों का प्रणयन किया। उन्होंने बंगला पुस्तक ‘निहलिस्ट रहस्य’ का अनुवाद किया। कर्मयोगी अरविंद घोष की पुस्तक ‘योग-साधना’ का अनुवाद भी रामप्रसाद ‘बिस्मिल’ ने किया।

सन 1916 में लखनऊ में कांग्रेस अधिवेशन का आयोजन हुआ। उस आयोजन में शामिल होने के लिए वे लखनऊ पहुंचे। वहीं उनका परिचय श्री गंदालाल दीक्षित से हुआ। गेंदालाल उस समय के प्रमुख क्रांतिकारी नेता थे। उन्हीं दिनों मैनपुरी षडय़ंत्र कांड हुआ। उस कांड में पुलिस को रामप्रसाद बिस्मिल की तलाश थी। वह चरवाहे की वेशभूषा में जानवर चराया करते थे और समय निकालकर साहित्य-सृजन किया करते थे।

क्रांतिकारी आर्थिक रूप से कमजोर थे। उन्होंने अपनी स्थिति मजबूत करने के लिए डकैती डालने की योजना बनाई। उसके नेता थे रामप्रसाद बिस्मिल। 9 अगस्त, 1925 को सहारनपुर-लखनऊ पैसेंजर ट्रेन से जाने वाले खजाने को ‘काकोरी’ नामक स्टेशन पर लूट लिया गया। वह डकैती क्रांतिकारियों के लिए बहुत महंगी पड़ी। रामप्रसाद ‘बिस्मिल’ और उनके नौ साथियों को गिरफ्तार कर लिया गया। मुकदमा चला और चार क्रांतिकारियों को फांसी पर लटका दिया गया।

19 दिसंबर, 1926 को भारत माता के इस अमर सपूत ने फांसी के फंदे को चूमकर अपने प्राणों को आहुति दे दी।

August 27, 2017evirtualguru_ajaygourHindi (Sr. Secondary), LanguagesNo CommentHindi Essay, Hindi essays

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आर्य बलिदानी पं० रामप्रसाद बिस्मिल

(११ जून, १८९७ – १९ दिसंबर, १९२७ )

पं० रामप्रसाद बिस्मिल जी की जीवन के अंतिम समय में जेल में लिखी गयी आत्मकथा। यह पुस्तक अंग्रेज़ अधिकारियों की नजरों से बचाकर बिस्मिल जी ने जेल में छोटे-छोटे कागजों पर लिखकर टुकड़ों में कई बार बाहर भेजी थी। क्रांतिकारियों की प्रेरणास्त्रोत यह पुस्तक सभी राष्ट्रभक्तों को अवश्य ही पढ़नी चाहिए। क्रांतिकारियों के जीवन को यथाचित्रित प्रस्तुत करती हुई यह पुस्तक आपको उनके कष्टों , यातनाओं व संघर्षों का सही-सही ज्ञान करवाएगी। आपको बता दें कि काकोरी ट्रेन डकैती के नेता बिस्मिल जी ही थे। इसी कारण इनको सीधी फांसी की सजा दी गयी।नित्य हवन करने वाले आर्य बिस्मिल जी 19 दिसंबर को भी यज्ञ करते हुए फांसी के फंदे को चूम गए। स्वातंत्र्य वीर पं० रामप्रसाद बिस्मिल जी के इस महान बलिदान ने भारत की आजादी की क्रांति को और तेज़ कर दिया था । बाद में चन्द्रशेखर आजाद , भगतसिंह , राजगुरु व सुखदेव जैसे हजारों देशभक्तों ने उनकी लिखी अमर रचना ‘सरफ़रोशी की तमन्ना’ गाते हुए अपने बलिदान दिये । पं रामप्रसाद बिस्मिल आदर्श राष्ट्रभक्त तथा क्रांतिकारी साहित्यकार के रूप में हमेशा अमर रहेंगे ।

“क्या ही लज्जत है कि रग-रग से यह आती है सदा

दम न ले तलवार जब तक जान बिस्मिल में रहे॥ ” – पं०रामप्रसाद बिस्मिल

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